Mithila va Maithila Rajavamshacha Itihasa By Gangabai
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1938 में ‘मिथिला व मैथिल राजवंश चा इतिहास’ नामक पुस्तक मूल रूप से मराठी में लिखी गई थी। बीसवीं शताब्दी में मिथिला के इतिहास पर लिखी गयी पहली तीन किताब में यह पुस्तक शामिल थी, जिसके कवर पृष्ठ पर इतिहास लिखा हुआ था। इसके पहले 1922 में श्याम नारायण सिंह की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ तिरहुत और 1936 में महामहोपाध्याय मुकुंद झा बख्शी कृत मिथिला भाषामय इतिहास प्रकाशित हुई थी। यह महज संयोग है कि बीसवीं शताब्दी के पहले तीन शुरूआती दशकों में मिथिला के इतिहास पर लिखी गई पहली तीन किताब तीन अलग-अलग भाषाओं क्रमशः अंग्रेजी, मैथिली और मराठी में लिखी गई थी। यह किताब दरभंगा राज के तीन-तीन महारानियों के गुरू गंगा बाई ने मूल रूप से मराठी भाषा में लिखी थी जिसका मूल के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद भी इस एक ही पुस्तक में है। दरभंगा राज का पेशवाओं के साथ अच्छा सम्बंध रहा है और यही कारण है कि दरभंगा के राज खजाने में पेशवाओं का नौलखा हार भी शामिल है।
यह किताब निश्चित रूप से मिथिला के प्रति आपके नज़रिए में एक सकारात्मक सोच लाएगा
Description
1938 में ‘मिथिला व मैथिल राजवंश चा इतिहास’ नामक पुस्तक मूल रूप से मराठी में लिखी गई थी। बीसवीं शताब्दी में मिथिला के इतिहास पर लिखी गयी पहली तीन किताब में यह पुस्तक शामिल थी, जिसके कवर पृष्ठ पर इतिहास लिखा हुआ था। इसके पहले 1922 में श्याम नारायण सिंह की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ तिरहुत और 1936 में महामहोपाध्याय मुकुंद झा बख्शी कृत मिथिला भाषामय इतिहास प्रकाशित हुई थी। यह महज संयोग है कि बीसवीं शताब्दी के पहले तीन शुरूआती दशकों में मिथिला के इतिहास पर लिखी गई पहली तीन किताब तीन अलग-अलग भाषाओं क्रमशः अंग्रेजी, मैथिली और मराठी में लिखी गई थी। यह किताब दरभंगा राज के तीन-तीन महारानियों के गुरू गंगा बाई ने मूल रूप से मराठी भाषा में लिखी थी जिसका मूल के साथ-साथ हिन्दी अनुवाद भी इस एक ही पुस्तक में है। दरभंगा राज का पेशवाओं के साथ अच्छा सम्बंध रहा है और यही कारण है कि दरभंगा के राज खजाने में पेशवाओं का नौलखा हार भी शामिल है।
यह किताब निश्चित रूप से मिथिला के प्रति आपके नज़रिए में एक सकारात्मक सोच लाएगा.

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